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Iran Protest: प्रतिबंधों, दबाव और विरोध के बीच एक जटिल हकीकत

आप ईरान से असहमत हो सकते हैं, लेकिन ज़रा ठहरकर उसके पिछले चार–पांच दशकों को देखिए। पहले उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। दशकों तक अर्थव्यवस्था कमजोर रही, लेकिन देश टूटा नहीं। शिक्षा प्रणाली ढही नहीं, मेडिकल और वैज्ञानिक रिसर्च जारी रही। किसी और देश पर इतने लंबे समय तक ऐसे प्रतिबंध होते, तो शायद वह सरेंडर कर देता—ईरान ने नहीं किया।

जब यह तरीका कारगर नहीं हुआ, तो सैन्य कमांडरों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। मगर ईरान में एक संस्थागत सिस्टम है—हर कमांडर अपना उत्तराधिकारी (successor) तैयार करता है, और वह आगे अपना बैकअप बनाता है। यानी नेतृत्व की निरंतरता। यह थ्योरी भी ईरान पर फेल हुई।

इसके बाद सीधे सैन्य टकराव का रास्ता अपनाया गया, जिसमें इज़राइल की भूमिका सामने आई। वहां भी ईरान ने कड़ा जवाब दिया—यह थ्योरी भी मनचाहा नतीजा नहीं दे सकी।

अब बात आती है आंतरिक असंतोष की। इतने लंबे प्रतिबंधों के बाद बेरोज़गारी और जीवन-स्तर का दबाव स्वाभाविक है। जनता रोज़गार और बेहतर ज़िंदगी चाहती है। राष्ट्रवाद अपनी जगह है, लेकिन अच्छा जीवन हर नागरिक की प्राथमिकता होती है। जब प्रदर्शन होते हैं, तो उनमें कई मुद्दे जुड़ जाते हैं—नौकरी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला अधिकार—सब एक साथ। ऐसे आंदोलनों में लोग अपने हित भी साधते हैं; यह मानव-स्वभाव है।

सारी थ्योरियाँ आज़माने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल इसे एक मौके की तरह देख सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यह रास्ता भी फेल होगा। हां, एक कड़वी सच्चाई यह है कि इससे ईरान के आम लोगों की परेशानी कम नहीं होगी। वे बीच मझधार में फंसे हैं—दबाव बाहर से, संकट भीतर से।

निष्कर्ष यह कि ईरान कोई एक-रेखीय कहानी नहीं है। वह प्रतिरोध, संस्थागत निरंतरता और सामाजिक दबाव—इन सबका जटिल मिश्रण है। उसे समझने के लिए सरल निष्कर्ष नहीं, गहरी पड़ताल चाहिए।

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