गलवान विवाद: तथ्य, फौजी जवाब और ‘नो-मैन्स लैंड’ का सवाल

इस पूरे विवाद के दो साफ़ सिरे हैं—और दोनों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है।
पहला सिरा:
पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने जो लिखा है, राहुल गांधी उसी को कोट कर रहे हैं। तथ्यों के लिहाज़ से राहुल गांधी सही हैं। 2020 में भारत और चीन के टैंक आमने-सामने (ऑयबॉल-टू-ऑयबॉल) तैनात थे। चीन ने आक्रामकता दिखाई और भारतीय सेना ने सही व सख़्त जवाब दिया।
यह भी तथ्य है कि हाथापाई/गुत्थम-गुत्था की लड़ाई में भारतीय जवानों ने चीनी सैनिकों को कड़ा सबक सिखाया। यह कोई प्रोपेगेंडा नहीं। चीनी सेना ने इस तरह के रिटेलिएशन की उम्मीद नहीं की थी।
सेना की तैयारी और जवाब:
डोकलाम के बाद भारतीय फौज ने सबक लिया था। गलवान घाटी में कर्नल संतोष बाबू ख़ुद चार्ज को लीड कर रहे थे। मीडिया कैमरों की अनुपस्थिति में फौज ने अपने तरीक़े से ऑपरेशन किया—और किया भी। चीन की ठीक-ठाक कैज़ुअल्टी हुईं, जिन्हें उसने कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया। बिहार और सिख रेजिमेंट के जवानों ने ज़मीनी लड़ाई में कड़ा प्रहार किया।
लंबे समय तक दोनों ओर से बिल्ड-अप रहा। एक मौक़े पर चीनी सैनिक अरुणाचल प्रदेश में काफ़ी अंदर तक आए। जवाब में पैरा एसएफ के जवानों ने चीनी क्षेत्र में करीब 15 किमी तक पैठ की। टैंक एक-दूसरे से महज़ कुछ सौ गज पर खड़े थे।
दूसरा सिरा (विवाद का केंद्र):
इस स्टैंड-ऑफ के बाद चीनी बॉडी लैंग्वेज बदली—यह भी सच है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि डिएस्कलेशन के नाम पर हमें नो-मैन्स लैंड में अपनी काफ़ी ज़मीन छोड़नी पड़ी। यही वह बिंदु है जिस पर सरकार खुलकर बात नहीं करना चाहती—और यही वही ज़मीन है जिसके बारे में राहुल गांधी दावा करते रहे हैं कि हमने चीन को दे दी।
निष्कर्ष:
गलवान में भारतीय सेना ने रणनीतिक और सामरिक स्तर पर मजबूत जवाब दिया—यह निर्विवाद है। पर डिएस्कलेशन के बाद ज़मीनी यथार्थ क्या बदला, कितना बदला—यह सवाल अब भी स्पष्ट, पारदर्शी जवाब मांगता है।