इंडिगो संकट : क्या भारत की एविएशन इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव की तरफ बढ़ रही है?

भारत में एयरलाइन इंडस्ट्री की हालत पर फिर सवाल उठ रहे हैं। दुखद बात यह है कि पिछले कई वर्षों से घरेलू उड़ानों में इंडिगो का 60–65% बाज़ार पर कब्ज़ा है। (DGCA डेटा: अगस्त 2025 में हिस्सा 64.2%)
जब किसी एक कंपनी की इतनी बड़ी पकड़ हो जाती है, तो उसकी हर गलती, हर कमी और हर गलत फैसले का असर पूरी इंडस्ट्री और यात्रियों पर पड़ता है—
महंगे टिकट, फ्लाइट कैंसिलेशन, घंटों की देरी और यात्री परेशान।
क्या बदला है 2025 में? (DGCA के नए FDTL नियम)
डीजीसीए (DGCA) ने पायलट थकान और सुरक्षा को देखते हुए जनवरी 2024 में नए सख़्त Flight Duty Time Limit (FDTL) नियम लागू किए।
ये नियम दो चरणों में लागू हुए — जुलाई 2025 और पूरी तरह 1 नवंबर 2025 से।
मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:
नियम पहले अब
साप्ताहिक आराम 36 घंटे 48 घंटे (अनिवार्य)
नाइट ड्यूटी में लैंडिंग की संख्या 6 तक केवल 2
लगातार नाइट ऑपरेशन अनुमति लगातार सिर्फ 2 बार
नाइट की परिभाषा सीमित विस्तृत — अधिक प्रतिबंध
फ्लाइंग लिमिट लचीली साप्ताहिक 35–60 घंटे, मासिक 100–125 घंटे, सालाना 1000 घंटे
इन नियमों का उद्देश्य है—
👉 पायलटों की थकान कम करना
👉 सुरक्षा बढ़ाना
👉 दुर्घटनाओं की संभावना को न्यूनतम करना

इंडिगो की दिक्कत या जानबूझकर टकराव?
इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार इंडिगो के पास इतने पायलट ही नहीं हैं कि नई शर्तों के तहत सभी उड़ानें सुचारू रूप से चल सकें।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है—
> “यह संचालन क्षमता का संकट कम और नियामकों को दबाव में लेने की रणनीति ज्यादा है।”
अर्थात — नई नीतियों का अनुपालन ना करते हुए सरकार पर दबाव बनाना, ताकि नियम ढीले पड़े।
—
और भुगत कौन रहा है?
✖ यात्रियों को घंटों इंतज़ार
✖ टिकट के दाम आसमान पर
✖ फ्लाइट्स कॉन्स्टेंटली री-शेड्यूल
✖ एयरपोर्ट पर अफरातफरी
—
सरकार को क्या करना चाहिए?
नियमों पर समझौता नहीं
एयरलाइंस को पायलटों की भर्ती और ट्रेनिंग बढ़ाने का आदेश
यात्रियों के लिए मुआवजा व्यवस्था सख़्त
एविएशन सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए नीतियाँ सरल करना
यह सिर्फ एक एयरलाइन का मामला नहीं — यह भारतीय एविएशन सिस्टम की संरचना, जवाबदेही और संतुलन का सवाल है।
नियमों का पालन न करना विकल्प नहीं है।
और जब किसी कंपनी का दायरा इतना बड़ा हो जाए कि उसकी गलती से पूरी जनता परेशान हो —
तो सरकार को हस्तक्षेप करना ही पड़ता है।




