भारत में ज़हर परोसता बाज़ार: नकली खाने-पीने की चीज़ों से लेकर दवाइयों तक, सिस्टम की नाकामी उजागर

देश में मिलावटखोरी और खाद्य सुरक्षा की हालत अब चिंताजनक से भी आगे निकल चुकी है। नकली कफ सिरप, नकली पनीर-घी, खराब मसाले, मिनरल ऑयल में तला फास्ट-फूड, होटलों में एक्सपायरी बदलकर बेचा गया खाना, और दवाइयों की तारीख़ बदल देना — ये सब दिखाता है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है।
यह केवल बाज़ार की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी है।
—
स्कूलों तक पहुंची लापरवाही
देशभर से स्कूलों के मिड-डे मील में मेढ़क, सांप या सड़ा हुआ खाना मिलने की खबरें आती रहती हैं। यह सिर्फ एक गलती नहीं — यह प्रशासनिक ढांचे की असंवेदनशीलता और लचर निगरानी का सबूत है।
—
मिलावट का जाल कितना गहरा है?
• दूध, पनीर और घी में डिटर्जेंट, वनस्पति तेल और केमिकल की मिलावट आम बात हो गई है।
• कई मसालों में जहरीले रंग और सस्ते इंडस्ट्रियल केमिकल का प्रयोग किया जाता है।
• सड़क किनारे दुकानों और रेस्तरां में बार-बार गर्म किए तेल में खाना पकाया जाता है।
• दुकानदार एक्सपायरी डेट बदलकर पुराना सामान नया बनाकर बेच देते हैं।
छापेमारी होती है, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वही कारोबार शुरू हो जाता है।
—
क्यों नहीं रुकता यह अपराध?
फूड इंस्पेक्टर बेहद कम हैं, निगरानी लगभग नाम मात्र की।
जुर्माने इतने छोटे कि किसी को डर नहीं लगता।
मुकदमे सालों कोर्ट में लटके रहते हैं, और सज़ा शायद ही कभी होती है।
सबसे बड़ा कारण — “सिस्टम सवाल नहीं पूछता।”
—
जनता की जान की कोई कीमत नहीं?
सवाल यह है — आखिर इन लोगों की हिम्मत इतनी क्यों बढ़ गई?
क्योंकि:
कड़ी कार्रवाई नहीं होती
सज़ा का डर नहीं है
जांच कमजोर है
और लाभ बड़ा, खतरा बहुत छोटा
—
अब वक्त है सख्त बदलाव का
अगर सरकार वाकई जनता की सुरक्षा चाहती है तो—
मिलावटखोरी को गैर-जमानती अपराध घोषित करना होगा।
दोषी पाए जाने पर लाइसेंस तुरंत रद्द होना चाहिए।
फूड और ड्रग इंस्पेक्शन एजेंसियों को स्वतंत्र और सशक्त अधिकार देने होंगे।
सज़ा का डर वास्तविक होना चाहिए, दिखावटी नहीं।
—
जब तक कानून सख्त नहीं होंगे, मुनाफे की भूख इंसानियत पर हावी रहेगी —
और जनता हर दिन ज़हर खाती रहेगी, यह सोचकर कि यह खाना है।





